Dhyan Chand Biography Hindi ,ध्यानचंद जीवनी

हॉकी खिलाड़ी ध्यानचन्द जीवन परिचय, अवार्ड 2021 | Dhyan Chand Hockey Player Biography in Hindi, Award

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मेजर ध्यानचंद , ये अपने आप  मैं वो शक्शियत हैं जो किसी परिचय के मोहताज़ नहीं है – उनकी प्रतिष्ठा , उनके हुनर से कौन वाकिफ नहीं है | हॉकी के खिलाडी मेजर ध्यानचंद जी एक समय के महान हॉकी प्लयेरों मैं शुमार थे और वह जाने जाते थे अपनी अलग तरीके से गोल करने की तकनीक से |  

ध्यानचंद जी ने अपने समय मई हुए लगातार  3 बार ओलंपिक्स मैं भारत को गोल्ड मैडल दिलाया , उनकी कुशलता और  उनके अलग तरीके ने सबका मन्न मोह लिया था -इसीलिए तो उनको हॉकी के जादूगर का नाम भी दिया गया | माना जाता है की उनकी पकड़ हॉकी पर इस कदर अच्छी थी के उनसे बॉल को ले पाना प्रतिद्वंदियों के पसीने छुड़ा देता था जिसके कारन उनको दी  विज़ार्ड का की उपाधि भी दी गई |

उन्होंने अपने पुरे करियर मैं 400 से ज़ादा गोल कर चुके है और समय समय पर उनको कई सम्मानों से पुरुस्कृत भी किया गया है जिसके बारे मैं हम आपको सरल तरीके से बताएंगे , कुछ अनसुने किस्से जो शायद अपने न सुने हो न जानते हो – उन सबसे रूबरू करवाएंगे | आपको बता दे के मेजर ध्यानचंद जी का आखरी मैच 1948 मैं  हुआ जो की लोकल स्टेट बंगाल की टीम से हुआ जिसका नतीजा ड्रा रहा |

मेजर ध्यानचंद  जी का  बहुत बड़ा योगदान रहा है हॉकी को एक नए मुकाम तक पोहचने मैं और भारत देश को अंतर्राष्ट्रीय लेवल पर एक नयी पहचान बनाने  मैं | उनके  इस एहम योगदान को सम्मान देते हुए भारत सरकार द्वारा “राजीव गांधी खेल रत्न अवार्ड” का नाम बदल कर “मेजर ध्यानचंद खेल रत्न अवार्ड” कर दिया गया है | यह सम्मान भारत के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी जी द्वारा घोषित किया गया |


मेजर ध्यानचंद बायोग्राफी (Major Dhyanchand Biography)

पूरा नामध्यान सिंह 
उपनामध्यानचंद , द विज़ार्ड, हॉकी विज़ार्ड, चाँद, हॉकी का जादूगर
पेशाहॉकी प्लेयर
जन्म तिथि29 अगस्त 1905
प्लेइंग पोजीशनफॉरवर्ड
मैदान में व्यवहारएनर्जेटिक
कोच / मेंटरसूबेदार – मेजर भोले तिवारी (पहले मेंटर)
पंकज गुप्ता (पहला कोच)
सर्विस / ब्रांचब्रिटिश इंडियन आर्मी एवं इंडियन आर्मी
सर्विस ईयरसन 1921 – सन 1956
यूनिटपंजाब रेजिमेंट
धर्महिन्दू
जातिराजपूत
गृहनगरझांसी, उत्तरप्रदेश, भारत
भारत के लिए खेले1926 से 1948 तक
अंतर्राष्ट्रीय डेब्यून्यूज़िलैंड टूर सन 1926 में
घरेलू / राज्य टीमझाँसी हीरोज
मैदान में व्यवहारएनर्जेटिक
कोच / मेंटरसूबेदार – मेजर भोले तिवारी (पहले मेंटर)
पंकज गुप्ता (पहला कोच)
ज्वाइन्ड आर्मीसिपोय (सन 1922)
रिटायर्डमेजर (सन 1956)
मृत्यु3 दिसम्बर 1979
मृत्यु स्थानदिल्ली, भारत
मृत्यु का कारणलिवर कैंसर
मृत्यु ke samey umr 74 साल

 

ध्यानचंद परिवार संछिप्त मे | Dhyanchand family in short

नामध्यानचंद
पिता का नामसूबेदार समेश्वर दत्त सिंह (आर्मी में सूबेदार)
माता का नामशारदा सिंह
पत्नी का नामजानकी देवी
भाईमूल सिंह और रूप सिंह
बेटेबृजमोहन सिंह, सोहन सिंह, राजकुमार, अशोक कुमार, उमेश कुमार, देवेंद्र सिंह और वीरेंद्र सिंह

शारीरिक जानकारी |  Physical Information

आँखों का रंगकत्थई 
हाइट5 फीट 7 इंच
वेट70 किलोग्राम
बालों का रंग काली

 


 

ध्यानचंद का जन्म | Dhyanchand ka janm (Date Of Birth And Place )

हॉकी के जादूगर कहे जाने वले ध्यानचंद का जन्म 29 अगस्त 1905 को उत्तर प्रदेश के अलाहाबाद ( प्रयागराज ) शहर मैं राजपूत घराने मैं हुआ | उनके पिता समेश्वर सिंह ब्रिटिश आर्मी में सूबेदार के पद को सँभालते थे और खुद भी हॉकी के शौक़ीन थे |


ध्यानचंद का परिवार | Dhyanchand family

जैसा की आपको मालूम हो चुका है की मेजर ध्यानचंद का जन्म उत्तर प्रदेश के अलाहाबाद शहर मैं हुआ था | उनके परिवार मैं उनकी माँ- शारदा सिंह  जो की एक ग्रहणी थी  , उनके पिता –समेश्वर दत्त सिंह जो की ब्रिटिश इंडियन आर्मी मैं सूबेदार के पद को सँभालते थे , उनकी पत्नी –जानकी देवी जो की ग्रहणी थी , उनके दो भाई – मूल सिंह जो की आर्मी मैं हवलदार था और  रूप सिंह जो की हॉकी प्लेयर था , उनके सात बेटे थे – बृजमोहन सिंह, सोहन सिंह, राजकुमार, अशोक कुमार, उमेश कुमार, देवेंद्र सिंह और वीरेंद्र सिंह |


 

ध्यानचंद की शिक्षा | Dhyanchand Education

आपको जानकर आश्चर्ये होगा की ध्यानचंद जी ने अपनी शिक्षा केवल छटवी कक्षा तक हे प्राप्त की – इसका एहम कारन था उनके पिता समेश्वर का आर्मी मै होना | आर्मी मैं होनी की वजह से उनके पिता का बार बार कई जगहों पर ट्रांसफर होता रहता था जिसके कारन पढ़ाई एक जगह स्थ्तिरता से कर न सके ,और आखिर मैं उनके पिताजी ने झाँसी , उत्तरप्रदेश मैं अपना निवास कर लिए और यही रहने लगे | झाँसी मैं ही हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद जी के नाम एक स्टेडियम भी स्तिथ है |


ध्यान सिंग से ध्यान चंद बनने तक का सफर  | Dhyan Singh se Dhyan Chand banne Tak Ka Safar

इसे किस्सा कहे या सफर ये तो नहीं पता पर हैं बहुत दिलचस्प आपको जानकर अच्छा लगेगा , तो चलिए जानते हैं कुछ किस्से जिन्होंने ध्यान सिंह को ध्यान चंद बना दिया |

ध्यान चंद जी का शरू से हॉकी या किसी स्पोर्ट्स मै ऐसी कोई खास रूचि नहीं थी , हाँ  रेसलिंग उनको पसंद थी पर मनोरंजन के तोर पर | उन्होंने हॉकी के बारे मै कोई  जानकारी न थी जब वे युवा अवस्था मैं थे | अपने दोस्तों के साथ अक्सर पेड़ लकड़ी यानि डाली तोड़ कर हॉकी नामा और कपडे की पोटली से बानी गेंद को लेकर दोस्तों के साथ खेलते रेह्ते थे और अपने आप अपनी तकनीक का इस्तिमाल करते रहते थे  | शयद यही से उनका मुक्कदर लिखना शरू हो गया था |

जब वह 14 वर्ष के थे तो उनके पिता समेश्वर उनको हॉकी का मैच दिखाने ले गए , वो मैच आर्मी की टीम का था | उस मैच को देखने के दौरान उन्होंने ये देखा की आर्मी टीम हॉकी का मैच हार रही है और ये देख कर उनके अंदर का छुपा हुआ टैलेंट उनको आगे जाकर खेलने क लिए उकसाने लगा जिसके कारन ध्यानचंद ने अपने पिताजी से आर्मी की तरफ से मैच खेलने की परमिशन लेने का आग्रह किया और उनको इजाज़त मिल गई | फिर क्या था आप सोच सकते है ऊपर वाले ने शायद सबकुछ पहले ही सोच रखा था मेजर ध्यानचंद के लिए और फिर उस मैच मैं मेजर ध्यान चंद ने हारती हुई आर्मी टीम को जिता दिया जिसमे उन्होंने खुद 4 गोल किये थे |

उनके इस टेलेंट  को देख कर आर्मी के हाई ऑफिसर्स बहुत खुश हुए और उन्होंने ध्यानचंद जी को आर्मी ज्वाइन करने का ऑफर दिया जिसको मेजर ध्यानचंद ने हाथोहाथ लिया और 16 साल की उम्र में 1922 में वह आर्मी के  पंजाब रेजिमेंट मैं  एक सिपाही बन गए| आर्मी मैं सिपानी बनने के बाद उन्होंने हॉकी को समझा और खेल को समझना चालू कर  दिया जिसकी वजह से उनमे उस खेल के प्रति दिलचस्पी आने लगी और इन सब मैं उनको मार्गदर्शन दिया मेजर तिवारी जी ने , इन्होने ध्यानचंद को सही गाइडेंस दी और बसिक्स पर फोकस करवाया ककी मेजर तिवारी खुद एक हॉकी प्लेयर थे |

बेसिक के बाद तो असली मोड़ आया जब ध्यानचंद के पहले कोच पंकज गुप्ता ने उनको ट्रैन करना शरू किया | ट्रेनिंग की दौरान ध्यानचंद के हुनर को देख कर कोच पंकज गुप्ता ने कह दिया कि एक दिन ये लड़का  पूरी दुनिया में चाँद की तरह चमकेगा , और यही से उनके कोच ने इनको चंद नाम मिला और ध्यानसिंह कि जगह ध्यानचंद से जानने  जाने लगे |


 

मेजर ध्यानचंद करियर | Major Dhyanchand Career

मेजर ध्यानचंद की शुरुवाती  करियर की बात की जाये तो मात्र 16 साल की उम्र में 1922 में पंजाब रेजिमेंट में सिपाही के तोर पर शरुवात हुई , जहाँ से उन्होंने फिर हॉकी की बारीकियों को जाना समझा और अपने खेल को और अच्छा किया |

  • वर्ष 1926 के हॉकी टूर्नामेंट जो की नूज़ीलैण्ड मे आयोजित हुए थे , के लिए मेजर ध्यानचदं का चुनाव हुआ और उन्होंने अपना उम्दा प्रदर्शन दिखते हुए भारत को जीत दिलवाई | इस मैच में कुल 20 गोल घाले गए जिसमे से 10 ध्यानचंद द्वारा दागे गए थे | 21 मैचों की इस श्रंखला में भारत ने 18 मैच में जीत 2 मैच ड्रा और 1 मैच में हार का सामना करना पड़ा था | इस पूरी श्रंखला में भारत ने 192 गोल्स दागे जिसमे से 100 गोल मेजर ध्यानचंद द्वारा किये गए थे | इस अद्बुध प्रदर्शन के कारन ध्यानचंद को आर्मी में लांस नायक बना दिया गया था उस समय |
  • वर्ष 1927 में लन्दन में आयोजित फोल्कस्टोन फेस्टिवल में भारत ने 10 मैचों की श्रंखला में 72 गोल दागे , जिसमें से ध्यानचंद ने 36 गोल अकेले हे किये थे |
  • वर्ष 1928 में आयोजित एम्स्टर्डम ओलिंपिक गेम  में भारतीय टीम ने  फाइनल मैच नीदरलैंड के साथ खेला  था, जिसमें भारत को पहला गोल्ड मैडल दिलाया  था |
  • वर्ष 1932 में आयोजित लासएंजिल्स ओलिंपिक गेम में भारत ने  फाइनल मैच अमेरिका के साथ  खेला था, जिसमें भारत ने 23-1 के ऐतिहासिक जीत के  साथ गोल्ड मैडल  हासिल किया था | 
  • वर्ष 1932 में बर्लिन ओलिंपिक में फाइनल जर्मनी के साथ हुआ था, ध्यानचंद ने अपने जूते उतार दिए और नंगे पैर मैच  को आगे खेला था, जिसमें भारत को 8-1 से जीत हासिल हुई और गोल्ड मैडल  मिला था | नंगे पैर मैच खेलने का डिसिशन ध्यानचंद ने इसलिए लिया ककी मैच के इंटरवल के पहले तक कोई भी गोल नहीं कर सकी थी भारतीय टीम इसलिए इंटरवल के बाद उन्होंने ऐसा करने का सोचा जिससे सफलता हासिल हुई |
  • मेजर ध्यानचंद ने अन्तराष्ट्रीय हॉकी  में  1948 तक योगदान  दिया , इसके बाद उन्होंने  रिटायरमेंट ले लिया. ध्यानचंद इसके बाद भी आर्मी में होने वाले हॉकी  मैचेस खेलते रहे थे |

माना जाता है की मेजर ध्यानचंद के टैलेंट के मुरीद हो गए थे जर्मनी के हिटलर और उन्होंने जर्मनी की टीम की तरफ से खेलने का प्रस्ताव भी भेजा लेकिन माहोर ध्यानचंद की मातृभूमि के लिए प्रेम ने उनको जाने से रोक लिया और उन्होंने बड़ी सरल रूप से इस  प्रस्ताव को मन कर दिया |


 

ध्यानचंद अवार्ड्स व अचीवमेंट (Dhyan Chand Award)

  • मेजर ध्यानचंद को भारत के दूसरे सबसे बड़े  पुरस्कार पद्मा भूषण से 1956 में सम्मान किया गया |
  • उनके सम्मान में भारत सरकार ने ध्यानचंद जी के नाम का ढाक टिकट भी शरू किया था |
  • 29 अगस्त को उनके सम्मान  में नेशनल स्पोर्ट्स डे के रूप हर साल मनाया जाता है|

 

ध्यानचंद ओलंपिक मैडल ( Dhyanchand Olympic Medals )

मेजर ध्यानचंद ने अपनी बेहतरीन कला का प्रदर्शन करते हुए तीन ओलंपिक्स में भारत को गोल्ड मैडल लाकर दिए | जिसमे सन 1928 से लेकर सन 1936 तक लगातार 3 गोल्ड मैडल जीते थे | हुनर , जज़्बा और मेहनत का कॉम्बो थे मेजर ध्यानचंद जी जिनकी मिसाल आज तक दी जाती है |


 

ध्यानचंद स्टेडियम कहां है | ( Dhyanchand Stadium kaha hai )

मेजर  ध्यान चाँद के नाम पर स्टेडियम का भी  निर्माण हुआ जो की नई दिल्ली में हैं , एक स्टेडियम उनके ग्रेहस्थाल यानि झाँसी जो की उत्तरप्रदेश में स्तिथ है |


 

ध्यानचंद की मृत्यु ( Dhyanchand  Death )

लेजेंड्री  मेजर ध्यानचंद  जो की हॉकी  के महान खिलाडी  थे अपने दशक मैं, उनकी  मृत्यु लिवर कैंसर की बीमारी के चलते हुई थी | उनके आखरी समय मैं इस बीमारी के चलते दिल्ली के एम्स मैं भर्ती कराया गया था | आखरी पालो मैं आर्थित सहायता भारतीय सर्कार द्वारा न मिलने के कारन मजबूरन उनको जनरल वार्ड मैं भर्ती करना पड़ा , जहाँ उनकी  3 दिसम्बर 1979 को मृत्यु हो गई |

 


FAQ’s

Q- ध्यानचंद जी की मृत्यु कैसे हुई | Major Dhyan Chand Ki death kese hui ?

Ans- लिवर कैंसर के कारन 

Q- ध्यानचंद जी की उम्र |  Dhyanchand  ki age kitni thi ?

Ans– 74 वर्ष 

Q : ध्यानचंद की मृत्यु कहां पर हुई | Dhyanchand ki death kaha hui ?

Ans : नई दिल्ली के एम्स हॉस्पिटल में

Q : ध्यानचंद के जन्म दिवस को किस रूप में मनाया जाता है | Dhyanchand ke janm diwas ko kis roop mai manaya jata hai?

Ans : नेशनल स्पोर्ट्स डे (National Sports Day )


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धन्यवाद

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